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ख़्वाहिशें

ख्वाहिशों का मिला था, दुनियादारी का भी झमेला था, कुछ करने की आश थी, बेचैनियाँ भी पास थी.. डर के साये थे, खुले आसमान तले उड़ने आए थे। हकीकत कुछ अलग थी, सपनों से थोड़ी similar थी.. थोड़ा सा था confusion, नहीं निकल रहा था conclusion.. मंजिल तो पास थी पर उस तक पहुंचने का नहीं था कोई solution !

खामोशियां

एक बार ख़ामोशियों और अल्फाजों में बहस हुई, शब्द तो चिल्लाते रहे और खामोशियां दबती रहीं,अल्फाजों में उलझी रही... क्योंकि सुनने के लिए तो सब थे पर महसूस करने के लिए कोई नहीं ।

क्या जरूरी है ?

क्या जरूरी है हर बात को बढ़ा चढ़ाकर बताना, क्या जरूरी है आईने से नजर हटते ही खुद को भूल जाना, क्या जरूरी है खुशी में आंसू बहाना और हर गम में मुस्कुराना, क्या जरूरी है हर बात को दिल से लगाना, जरूरी तो नहीं हर मुलाकात का समय पर हो जाना, जो टूटने हो बाद में खुद के ही हाथों, जरूरी ही क्या है ऐसे नियम बनाना ।

दोस्ती

सुनो,  शायद तुम सही हो.. ये दोस्ती हमारी बस नाम की है, जब जरूरत हो तुम्हे तो तुम्हारे काम की है.. हर दफा इस रिश्ते में बंध कर रह जाती हूं,  अब शायद फिक्र मुझे इसके अंजाम की है.. वो बातें जो तुमसे छुपाई ना थी, कहानियां जो अधूरी सुनाई ना थी.. शायद उनका परिणाम है यही इस दोस्ती में, मैं हार गई :(